26 मई, 2008

आजाद

बाल्य-काल में आजाद को पेडों पर चढकर गुलाम-डण्डा खेलने का बहुत शॉक था। भील बालकों के साथ तीर-कमठे लेकर निशानेबाजी का अच्छा अभ्यास आजाद ने कर लिया था। आजाद को शिकार खेलने का बचपन में ही शॉक लग गया था।
क्रान्तिकारी जीवन में अपने बचपन के साथियों से वे कहा करते थे कि बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था। आजाद झूठ बोलना या गप लडाना जानते ही नहीं थे। भीतर ऑर बाहर जो था एक सा था।
ओरछा के जंगल में एक बार अज्ञातवास के समय साधुवेश में उन्हें पुलिस वालों ने पकडकर पूछा था कि- "तुम्हीं आजाद हो ?" तो आजाद ने बिना झूठ बोले कह दिया था-
"हाँ भॅया, हम आजाद नहीं तो क्या हॅ, सभी साधु आजाद होते हॅ। हम किसी के बाप के गुलाम थोडे ही हॅ। हनुमान जी की चाकरी करते हॅ ऑर आजाद रहते हॅ।" पुलिस वाले साधु महाराज को छोडकर चले गए थे।
''उनका कथन बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था, सत्य ही हॅ। भीलों के साथ कई बार वे शेर के शिकार में शामिल होते थे। ऑर एक-दो बार अपनी धाक जमाने के लिए कि "शेर का मांस मुझे हानि नहीं पहुँचा सकता, उन्होंने तीख मं आकर शेर का मांस खाया भी था। वॅसे बहुत गर्म होने के कारण शेर का मांस खाया नहीं जाता हॅ।''
- ( श्रीकृष्ण सरल, महाकाव्य ग्रंथावली, प्रथम संस्करण- २७ फरवरी १९९२ ई०, प्रकाशक बलिदान भारती, २७ दशहरा मैदान, उज्जैन (म०प्र०)

2 Comments:

At 04 अगस्त, 2012, Anonymous Rahul said...

Chand adhura hai sitaro ke bina,
Gulshan adhura hai baharuon ke bina,
Samundar adhura hai kinaro ke bina,
Jeena adhura hai tum jaise yaaro ke bina….

 
At 12 जनवरी, 2014, Anonymous Rahul said...

घर कितने हैँ मुझे ये बता, मकान बहुत हैँ।
इंसानियत कितनो मेँ है, इंसान बहुत हैँ॥
मुझे दोस्तोँ की कभी, जरूरत नहीँ रही।
दुश्मन मेरे रहे मुझ पे, मेहरबान बहुत हैँ॥
दुनिया की रौनकोँ पे न जा,झूठ है, धोखा है।
बीमार, भूखे, नंगे,बेजुबान बहुत हैँ॥
कितना भी लुटोँ धन,कभी पुरे नहीँ होँगे।
निश्चित है ...

 

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